हिमालयी औषधीय पौधों के गुणों की शोध: अस्थमा, बुखार व संक्रमण के लिए उपयोगी

हिमालयी औषधीय पौधों के गुणों की शोध: अस्थमा, बुखार व संक्रमण के लिए उपयोगी
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कम शब्दों में कहें तो: हिमालयी पौधों के औषधीय गुणों का आधिकारिक प्रमाण, अस्थमा, बुखार और संक्रमण के उपचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
देहरादून – हिमालयी औषधीय पौधे, जिन्हें आदिवासी समुदायों द्वारा सैकड़ों वर्षों से चिकित्सा में उपयोग किया जाता रहा है, अब वैज्ञानिक जांच के माध्यम से उनके स्वास्थ्य लाभों के लिए प्रमाणित किए जा रहे हैं। शूलिनी विश्वविद्यालय के स्कूल ऑफ बायोलॉजिकल एंड एनवायरनमेंटल साइंसेज की सहायक प्रोफेसर डॉ. राधा की हालिया अध्ययन में सिद्ध हुआ है कि ये पौधे अस्थमा, बुखार, पीलिया, शारीरिक दर्द, श्वसन संबंधी समस्याओं और संक्रमण जैसे कई स्वास्थ्य मुद्दों के निदान में सहायक हो सकते हैं।
पौधों के स्वास्थ्य लाभ
डॉ. राधा के अध्ययन में यह निष्कर्ष निकला है कि हिमालयी पौधों में एंटीऑक्सीडेंट, एंटीमाइक्रोबियल, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-डायबिटिक, एंटी-कैंसर और यकृत-संरक्षण गुण होते हैं। हाल के वर्षों में, उन्होंने चार पेटेंट दर्ज कराए हैं, जो पारंपरिक ज्ञान को फंक्शनल फूड्स और प्राकृतिक एंटीमाइक्रोबियल उत्पादों में बदलने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम दर्शाते हैं।
विशेष रूप से प्रभावशाली सेमल के फूल
अध्ययन में सेमल के फूल को विशेष रूप से आशाजनक पाया गया है। पारंपरिक चिकित्सा में इनके शीतल और पुनर्स्थापनात्मक गुणों की बड़ी मान्यता है। वैज्ञानिक परीक्षणों में यह फूल पोषण तत्वों जैसे आहार फाइबर, फिनॉल्स और फ्लेवोनॉयड्स से भरपूर पाया गया है, जो एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-इंफ्लेमेटरी गतिविधियों में सहायक होते हैं। डॉ. राधा ने सेमल के फूल और सेब से बने जैम और एक रेडी-टू-सर्व ड्रिंक तैयार की है, जो सभी सक्रिय यौगिकों को सुरक्षित रखता है। ये उत्पाद कृत्रिम संरक्षक या रंग से मुक्त हैं।
अन्य महत्वपूर्ण पौधे और उनके गुण
डॉ. राधा के अनुसंधान में दो अन्य हिमालयी पौधों – प्रिंसेपिया यूटिलिस (हिमालयी चेरी) और गिलोय – ने भी महत्वपूर्ण एंटीमाइक्रोबियल गतिविधि दिखाई। प्रिंसेपिया यूटिलिस, जो भारतीय और चीनी पारंपरिक चिकित्सा में लंबे समय से उपयोग हुआ है, क्लेब्सिएला न्यूमोनिया और स्ट्रेप्टोकोकस पायोजीनस जैसे जीवाणुओं को रोकने में सक्षम है। दूसरी ओर, गिलोय ने भी साबित किया है कि ये प्राकृतिक एंटीमाइक्रोबियल एजेंट के रूप में बहुत प्रभावी हो सकते हैं।
पारंपरिक ज्ञान का वैज्ञानिक दस्तावेज़ीकरण
डॉ. राधा का कहना है, "हिमालय की जनजातियाँ पारिस्थितिक ज्ञान का जीवित भंडार हैं। पारंपरिक औषधियाँ अब प्रयोगशाला में औषधीय क्षमता के साक्ष्यों के साथ प्रमाणित हो चुकी हैं। हमारा उद्देश्य इस ज्ञान को वैज्ञानिक साक्ष्यों से जोड़ना है ताकि ये निवारक स्वास्थ्य देखभाल में योगदान दे सकें।" उनके एथ्नोबॉटनिकल सर्वे में 1,600 से अधिक हिमालयी पौधों का दस्तावेजीकरण किया गया है, जो इस क्षेत्र के पौधों के फाइटोकेमिकल और औषधीय विश्लेषण के लिए महत्वपूर्ण होगा।
संरक्षण की आवश्यकता
हालांकि, जड़ों और छाल की अस्थिर कटाई से कई संकटग्रस्त हिमालयी पौधों जैसे कुटकी, भारतीय जेंटियन, श्वेत हिमालयी कुमुदिनी, और हिमालयी जंगली जौ के अस्तित्व पर गंभीर खतरा है। इसलिए, पारंपरिक ज्ञान का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण और संरक्षण पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गया है।
वैज्ञानिक सहयोग
यह शोध कार्य एडवांस्ड नेशनल रिसर्च फाउंडेशन (ANRF) के सहयोग से किया गया है। बॉटनिकल सर्वे ऑफ इंडिया, डॉ. वाई.एस. परमार यूनिवर्सिटी ऑफ हॉर्टिकल्चर एंड फार्मास्यूटिकल साइंसेज, और विभिन्न अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालयों के सहयोग से यह कार्य आगे बढ़ रहा है।
हिमालयी पौधों के औषधीय गुणों को प्रमाणित करना, यह दर्शाता है कि कैसे पारंपरिक औषधियाँ आधुनिक स्वास्थ्य सेवाओं में महत्वपूर्ण योगदान कर सकती हैं।
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सादर,
टीम नैनीताल समाचार
शिवानी शर्मा
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