जब सतर्कता ही संदेह के घेरे में? सतर्कता विभाग के कार्यप्रणाली पर उठते सवाल

सतर्कता विभाग के कामकाज पर सवाल: क्या उत्तराखंड सतर्कता विभाग निर्दोष लोगों को फंसा रहा है? जानें कैसे गलत प्रक्रियाओं से लोगों को न्याय के बजाय अन्याय मिल रहा है।

Aug 30, 2025 - 00:27
Aug 30, 2025 - 00:32
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जब सतर्कता ही संदेह के घेरे में?  सतर्कता विभाग के कार्यप्रणाली पर उठते सवाल
जब सतर्कता ही संदेह के घेरे में? सतर्कता विभाग के कार्यप्रणाली पर उठते सवाल

हल्द्वानी/उधम सिंह नगर: भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में सतर्कता विभाग (Vigilance Department) एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका मुख्य उद्देश्य भ्रष्ट अधिकारियों को रंगे हाथों पकड़ना और उन्हें कानून के कटघरे में लाना है। हालांकि, हाल के दिनों में कुछ ऐसे मामले सामने आए हैं जहां सतर्कता की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठ रहे हैं, खासकर तब जब किसी व्यक्ति को फंसाने के लिए कथित तौर पर त्रुटिपूर्ण प्रक्रिया का उपयोग किया जाता है। एक अधिकारी पर लगाए गए आरोपों पर गौर करें, जहां सतर्कता विभाग ने यह दावा किया कि ट्रैप से पहले ही एफआईआर दर्ज कर ली गई थी। इस दावे ने एक बहस छेड़ दी है: क्या एक सतर्कता जांच सिर्फ रंगे हाथों रिश्वत लेते हुए पकड़ने तक सीमित है, या क्या यह एक पूर्वनियोजित प्रक्रिया का हिस्सा है जिसमें निर्दोष लोगों को भी फंसाया जा सकता है? ⚖️

प्रक्रिया में खामियां और निर्दोषों की पीड़ा

कानून के जानकार मानते हैं कि जांच (investigation) और ट्रैप (trap) ऑपरेशन के बीच एक स्पष्ट अंतर होता है। भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत, रिश्वत की मांग करना ही एक अपराध है। इसलिए, शिकायत मिलने पर विभाग एफआईआर दर्ज कर सकता है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह प्रक्रिया हमेशा निष्पक्ष होती है?

जब किसी अधिकारी के खिलाफ कोई शिकायत आती है, तो सतर्कता विभाग को उसकी प्रारंभिक जांच (preliminary inquiry) करनी होती है। इसमें शिकायत की सच्चाई और आरोपी की मंशा को परखा जाता है। अगर यह जांच सही साबित होती है, तभी ट्रैप की कार्रवाई की जानी चाहिए।

हालांकि, कुछ मामलों में यह देखा गया है कि:

  • शिकायतकर्ता की विश्वसनीयता की जांच नहीं होती: कई बार शिकायतकर्ता का इतिहास आपराधिक होता है या वह किसी निजी दुश्मनी के चलते शिकायत करता है। यदि ऐसे व्यक्ति की शिकायत पर बिना गहन जांच के कार्रवाई की जाती है, तो इसका सीधा असर आरोपी की प्रतिष्ठा पर पड़ता है।

  • वैज्ञानिक साक्ष्यों में हेरफेर: फिनॉल्फ्थलीन पाउडर जैसे रासायनिक परीक्षणों को अक्सर हेरफेर करने के आरोप लगते हैं। यदि आरोपी को किसी भी तरह से इस पाउडर के संपर्क में लाया जाता है, तो ट्रैप सफल माना जाता है, भले ही रिश्वत लेने की कोई स्पष्ट मंशा या सबूत न हो। यह वैज्ञानिक साक्ष्य की प्रामाणिकता पर सवाल खड़ा करता है।

  • गवाहों की निष्पक्षता पर सवाल: अक्सर ट्रैप ऑपरेशन में स्वतंत्र गवाहों की कमी होती है। इसके बजाय, विभाग के अपने कर्मचारी या पक्षपाती गवाहों का उपयोग किया जाता है, जिससे पूरी प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह होता है।

कानूनी पहलू और न्यायिक हस्तक्षेप

अदालतें भी इन मुद्दों को गंभीरता से लेती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई फैसलों में यह स्पष्ट किया है कि केवल रिश्वत लेने का आरोप ही पर्याप्त नहीं है। अभियोजन पक्ष को यह संदेह से परे साबित (prove beyond reasonable doubt) करना होगा कि रिश्वत की मांग (demand) और स्वीकृति (acceptance) हुई थी।

उदाहरण के लिए, नीरजा दत्ता बनाम राज्य (एनसीटी) के मामले में, कोर्ट ने जोर देकर कहा कि वैज्ञानिक साक्ष्य जैसे फिनॉल्फ्थलीन परीक्षण, मांग और स्वीकृति के सबूत के बिना बेकार हैं। यह फैसला निर्दोष लोगों को फंसाने (framing innocent people) से बचाने के लिए एक महत्वपूर्ण मिसाल बन गया है।

ट्रैप के बाद भी जारी संघर्ष

एक बार जब किसी अधिकारी को ट्रैप में फंसाया जाता है, तो उसकी जिंदगी बदल जाती है। भले ही वह अदालत में निर्दोष साबित हो जाए, लेकिन इस प्रक्रिया से उसकी प्रतिष्ठा, मानसिक स्वास्थ्य और करियर को गंभीर नुकसान पहुंचता है।

  • सामाजिक बदनामी: गिरफ्तारी और मीडिया कवरेज के कारण उस पर भ्रष्टाचार का कलंक लग जाता है, जिससे समाज में उसकी छवि खराब होती है।

  • कानूनी लड़ाई: लंबी और थकाऊ कानूनी लड़ाई में उसे अपना समय और पैसा खर्च करना पड़ता है, जो उसके परिवार के लिए एक बड़ा बोझ बन जाता है।

  • कैरियर का अंत: भले ही वह बरी हो जाए, लेकिन इस मामले का दाग उसके सेवा रिकॉर्ड पर बना रहता है, जिससे उसके प्रमोशन और आगे के करियर पर असर पड़ सकता है।

निष्कर्ष

सतर्कता विभाग का काम भ्रष्टाचार को खत्म करना है, न कि संदेह के आधार पर निर्दोष लोगों को फंसाना। अगर ट्रैप से पहले एफआईआर दर्ज करने का दावा किया जाता है, तो यह सुनिश्चित करना और भी महत्वपूर्ण हो जाता है कि पूरी प्रक्रिया पूरी तरह से निष्पक्ष और पारदर्शी हो। यह जरूरी है कि विभाग अपनी कार्यप्रणाली में सुधार करे, ताकि न्याय के नाम पर किसी निर्दोष के साथ अन्याय न हो। प्रक्रियागत खामियां (procedural flaws) सिर्फ एक कानूनी मुद्दा नहीं हैं, बल्कि यह हमारे न्याय प्रणाली में जनता के विश्वास को भी ठेस पहुंचाती हैं।

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